Friday, December 30, 2016

दिल फ़रेब उम्र पैतालीस की

बड़ा ही जीवट वो
एक नन्हा बच्चा
जिसको सज़ा-ए-नीलडाउन में
नाचते हुए देख कर
हम अपने भीतर के
निःस्तब्ध बचपन को
खंरोचते थे
चाहते थे कि
कहीं तो मेरे अंदर
कुछ हलचल हो
और उस सा चंचल
हो जाऊं
मेरा दोस्त था वो


एक नन्हा बच्चा
जिसे मैं बचपन से जानता था
जीवन की दिल फरेबी से
उम्र पैतालिस में
उसी क़ुएसचन- पेपर
की तरह रुस के वैसे ही
जा छुपा है जैसे
बचपन में बेजवाब सवालों
से लदे प्रशन पत्र
हमारी नासमझी
हमारी नक़ाबीलियत का प्रमाण
रिपोर्ट कार्ड में
खोल खोल देते थे।
मेरा दोस्त था वो .................


~ सूफ़ी बेनाम

नीलडाउन - kneel-down ; 

Remembering Anil Bhatia ( a class mate from St. Aloysius), who left us all of a sudden, unannounced at 45. 





Thursday, December 22, 2016

काश हद खुद की हम सिए होते



अब्दुल हमीद अदम के एक मिसरे में गिरह देकर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :
वज़्न - 2122 1212 22 / 112
अर्कान - फाइलातुन मुफ़ाईलुन फैलुन
बह्र - बह्रे खफी़फ मुसद्दस मख्बून
काफ़िया - ए (स्वर)
रदीफ़ - होते

गिरह :
आस भर कर उफन उठी लहरें
काश थोड़ी सी हम पिए होते

मतला :
दिल शिकन चार तो दिए होते
दर्द ले साथ हम जिए होते

वक़्त वीरान सी पहेली है
गुफ़्तगू आप ही किए होते

आशना आप और पहेली भी
सांस पे सांस से गुदे होते

छू सके गर नहीं तुम्हे लब से
अक्स को चूम कर जिए होते

राज़दां दिलबरी रही तुम से
काश हद खुद की हम सिए होते

करवटें आप तक न दें पहुंचा
ख़्वाब निगरान तो किए होते

तापते रह गये दिल-ए-ज़ीनत
सर्द बेनाम ही जले होते

~ सूफ़ी बेनाम







Monday, December 12, 2016

जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

जनाब साहिर लुधियानवी साहब के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश
गिरह :

इश्क़ की आह पे पीता गया तम का प्याला
आप अब शौक से दे लें जो सज़ा देते हैं

मतला :

जीते वो ही हैं जो हर दिन को जला देते हैं
खोजते नौ को हैं यादों को सुला देते हैं

रात अब तलक नहीं भूल सकी वो हसरत
ख्वाब रातों को यूं मखमल की सज़ा देते हैं

प्यास की स्याह तलब और नफ़ी की आदत
जो नहीं जानते मज़हब की दवा देते हैं

भूल कर आप का घर राह की मंज़िल पे हम
गोया परछाई हक़ीक़त में मिला देते हैं

हम भी बेनाम रहे यूं कि दिलों के प्याले
अश्क़ में अस्ल को हर रोज़ जगा देते हैं

~ सूफ़ी बेनाम


-- 2122 1122 1122 22/112


नक़ाब

मेरे नक़ाब को अपनी आँखे चुभाने वाले
कभी मुझे छू के महसूस तो किया होता
ज़िन्दा वो झूठ भी हैं जो राज़ बने रहते हैं
माँस ये चेहरे को महसूस तो किया होता
लाल लहू उतना ही है नकाब का जितना
असल के चहरों ने था हर रोज़ पिया होता
काश तू उन से अलग होता उनसे जिनने
सच के वास्ते सौ झूठ क़त्ल किया होता।

~ सूफ़ी बेनाम


वरदा

खैरियत बंदिशों में है तब तक
बह्र तूफ़ां जगा रही जब तक

आसरे जो रहा हवाओं के
वो सफीना नहीं मिला अब तक

दरमियां आप भी पहेली भी
नज़र तूफ़ां से जा मिली तब तक

डूबना इश्क़ में बेमानी था
मिल रही चाह गर हो मतलब तक

टूटने लग गये सभी अपने
आरज़ू हो गयी नफ़ी लब तक

मौत दो चार की हुई जिनको
घर नहीं शहर दे सका अब तक

छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आज तो खैरियत रहे शब तक।
or
छूट कर ज़ुल्फ़ से गिरा वरदा
आब -ओ -गिल अमन रहे शब तक।

~ सूफ़ी बेनाम

2122 1212 22 / 112

वरदा - red rose, बह्र - meter in poetry /ocean, सफीना - boat, नफ़ी - forbidden, denial, आब -ओ -गिल - water and earth - elements of nature


ख्वाइशों के डोडे

अब
अतीत का शोर
वर्तमानी-दरीचों के
पारभासी काँच से भरे
नाज़ुक दिलहों पर
दस्तक़ नहीं करता ।
 
न ही
भविष्य की अफवाहें
कुरेदती हैं उम्मीद के
फाहों से
आज के नाखूनों में
गुदे हिसाब-क़िताब।
व्यग्र-उद्वेग वासना भी
अपनी बेमियादी
की घोषणा
बदन की सतह पर
करके
धमनियों में प्रवाहित
होने के लिये
एक स्पर्श के आभाव से
शेर दर शेर
ग़ज़लों में
जमने लगी हैं।
मौसम सर्द गर्म
और बारिश के सिवा
अब कुछ भी नहीं।
मुराद-ए-वस्ल
जगती है
दिखती हैं
मज़ाक बनती हैं
ग़ुज़र जाती हैं।
नर्म तकिये भी
ख्वाइशों के डोडों से फूट-कर
सेमल से  
रेशमी नकाब चढे
कुछ बीज
ले उड़े हैं।

तुम सुनाओ .........
क्या ये बीज
तुम्हारी ख्वाइशों के
फ़ित्ना-गर गिल की
नमी पे
अंकुर तो नहीं
छोड़ बैठे हैं ?

~ सूफ़ी बेनाम


Saturday, December 3, 2016

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी

वज़्न - 2122 2122 212
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
बह्र - बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ
क़ाफ़िया - आया
रदीफ़ - देर तक
मशहूर शायर आदरणीय नवाज़ देवबंदी जी के मिसरे में गिरह दे कर ग़ज़ल में उतरने की कोशिश :

मोड़ वीराने पे रुकना हमसफ़र
धूप रहती है न साया देर तक

मतला :
ख्वाब का दर खटखटाया देर तक
रात ने हमको नचाया देर तक

करवटों में पल रहे थे सपने जो
अदब का मतलब सिखाया देर तक

आस एक सोकी थी सिरहाने ने यूं
पास रहकर दिल जलाया देर तक

सच चुभा करते नहीं पैरों में जो
झूठ बन कर फिर रुलाया देर तक

साँस जब भी आशना मिलती नहीं
अखतरों ने टिमटिमाया देर तक

ख़्वाब खुद नहीं चल पाते कभी
रात कर्ज़ों को चुकाया देर तक

साथ तेरा फिर पहेली था बना
महज़ एक वादा निभाया देर तक

~ सूफ़ी बेनाम