Saturday, April 15, 2017

वो दिन वापस ला सकती हो

वो दिन वापस ला सकती हो

साकी की वो मीठी य़ादें
बीते लम्हे बीती बातें
साल बयालिस मौसम सारे
क्या तुम वापस ला सकती हो

वो दिन वापस ला सकती हो

आगे धुंधला धुंधला है सब
पीछे घोर अंधेरा है अब
मुझसे जुडकर इक साया बन
खुश मन गाना गा सकती हो

वो दिन वापस ला सकती हो

भीगे दो तन साथ जुडे थे
लगते खारे लब को लब थे
गर्मी की उन दोपहरों को
क्या तुम जीने आ सकती हो

वो दिन वापस ला सकती हो

क्यों ये सीला सूनापन है
भावों की तृष्णा मद्धम है
व्याकुल उजड़ा दिल भरमाने
फिर से वापस आ सकती हो

वो दिन वापस ला सकती हो


क्रमशः

~ सूफी बेनाम


( भीम बेटका की गुफाओं में लिखी एक कविता )

Friday, March 31, 2017

है शायरी दवा मेरी, अकेलापन इलाज है

दो चार रासते मिला, शहर बसा लिया तो क्या
शहर-शहर दरिंदगी, है कोय भी नहीं सगा

हूँ मुस्करा मैं यूं रहा कि उलझने तो आयेंगी
कि मैं था कुछ झुका-झुका, न जाने क्यों उसे लगा

है शायरी दवा मेरी, अकेलापन इलाज है
ज़रा बताओ साथ में है, कौन किसके खुश रहा

जो पांच तत्व से बने, मिलेंगे संग तत्व में
है नाम की दीवार से, बदन-बदन बटा हुआ

है चोट से नयी किसी, न भर सका था ज़ख्म वो
जो आस पर जला रहा जो ख्वाब पर रहा टिका

अगर नज़र कभी मिले तो, दिल पे कुछ खुमार हो
मैं मिल रहा सभी से था, दिलों से प्यार मांगता

मुकाम अपने प्यार के फ़क़त लगा उजाड़ने
बेनाम जो न रह सका, वो रूह तक झुलस गया

~ सूफ़ी बेनाम

1212 x 4


Monday, March 27, 2017

ये अंधड़ का अँधेरा है या खोया सब नसीबों में

ये अंधड़ का अँधेरा है या खोया सब नसीबों में
दिल-ए-रेगिस मिला हमको नफ़ी के इन सराबों में

ज़रा अब सुरमें दानी से निकालो ख्वाब की हलकें
कभी तो अस्ल की शकलें लगा दो इन शबाबों में

कहीं नाहक अचानक से हों तुम से फिर मुलाक़ातें
न जाने क्यों छुपाता है शहर तुमको किताबों में

वही नुख्ता जो ठोड़ी पर खिला हर्फ़ों की बाली संग
लगा लो तुम ग़ज़ल के संग मिलो हमको खरबों में

चुभे कीकड़ की छावों सी, भसक रस्मों रिवाजों की
कहो तो बांध लें निस्बत तुमारी हम रक़ाबों में

लगा बेनाम हर चहरा, फ़ना सब धूल में आलम
बहुत ही झूठ सा सच है मिला हमको हिसाबों में

~ सूफ़ी बेनाम

रक़ाब- stirrups, हर्फ़ों - letters, हलकें - chains, निस्बत - relation, अंधड़ - dust-storm, नफ़ी - forbidden, सराब - miraj,



Monday, March 13, 2017

होली - २०१७

रंग से रग को सींचा करते
मय से मधुरिम हौले- हौले
हो कर मौसम-योगित शायर
बहका करते गिरते-पड़ते

एक जुमले में खुद को गूंथे
रम्या-मोहन लीला करते
मिथ्यावादी हो कर शायर
खेलो स्याही में बहकर के

सावन बीता, तन भरमाये
देखो कैसी बदली लाये
भूखी कलमें बहका शायर
गजरी-पायल सब शरमाये

वृन्दावन का गौहर बनके
प्रियवर-गिरधर मोहन-राधे
नित-फागुन की ज्वाला शायर
यौवन चिंगारी दहकाये

असली-नकली मिलकर नाचे
सत-रंगी ज्वाला पर लहके
बनकर आफत खेलो शायर
रोकोगे तो जल जाओगे

हर गोरी संग होली खेले
लीला-कृष्णा-साथी ग्वाले
रमता जोगी सच्चा शायर
अनजाने हाथों से रंगके

भीषण तमन्ना रंगी साये
भीगे कपडे तन पे चिपके
प्यासी नज़रें रखता शायर
लिखता जाये बरसों जलके

रज-कञ्चन-कनु-प्रिया तरसे
आहों की टोली के सदके
सांसें-तृषित हमदिल-शायर
केसरिया रौनक पर बहके

झंझावट सदगुण सब भूले
इक प्याले को पलटा भागे
सरगम मदिरालय के शायर
पर-प्रियसी संग फगुआ गाये

मोहन की प्रियसी तू राधे
टेसू-रस पिचकारी भरके
सीधे तुझपे साधे शायर
आयुध-सब चाहत भर दागे।

~ सूफ़ी बेनाम





Saturday, March 4, 2017

उलझा हुआ मांझा

आसमां से गिर कर
खुद से ही खुद को बांधता हुआ,
नायाब ग्रंथियों की
पेचीदा गांठों में उलझा,
अपनी तीव्रता से
अपनी ताकतों को चीरता
फलक की दूरियों को
छू कर के लौटा,
दरख्तों पर, टहनियों पर,
तार के खम्बों पर,
लटकता हुआ,
छतों पे हवाओं के वेग से
गर्द में सना हुआ,
बेपरवाह एड़ियों को
बेवजह काटता,
डैनों को डैनों से 
घेरता-फँसाता,
लहू का प्यासा नहीं हूँ,
पर मैं, बस मैं ही हूँ।

वैसे ही जैसे
टूट कर हवा में रोमणी
लट के उलझे शेष,
घूमते हैं,
ढूँढ़ते हैं कोने
जबकी सधी हुई जुल्फें
कटी पतंग जैसी
हवा के मंतव्य को समझते हुए
अपनी मंशा से
कभी जूड़े कभी चोटियों की
पेचीदा बनावट की
उड़ान में
बांधव की रस्सियों को
तोड़ कर आगे
बढ़ जाती हैं।

और मैं
उलझा हुआ मांझा
आसमां से गिर कर
खुद से ही खुद को बंधता हुआ..........


~ सूफ़ी बेनाम





Wednesday, March 1, 2017

सिलवटें गुम हों अगरचे यार तो

मतला:
प्यास में बरसों निभाने पड़ गये
वस्ल के पोखर में कीड़े पड़ गये

तिलमिलाया मैं जो आदम ज़ात तो
रूह से रिश्ते बताने पड़ गये

कोई वादा हमने कब उनको किया
मुस्कराये तो, वो पीछे पड़ गये

फूल से एहसास वो मुस्कान के
मौसमों के बाद हलके पड़ गये

एक अधूरी शाम है कहती सुनो
तेज़ जो दौड़े थे धीमे पड़ गये

जब निहारा प्यास ने बिस्तर मेरा
कह रही थी आप ढ़ीले पड़ गए

टूट कर तकियों ने बस इतना कहा
जान के थे रात लाले पड़ गये

दर्द देने लग गयी थी करवटें
रात को मरहम लगाने पड़ गये

मुस्कराये पेड़ पे दो फूल जो
ज़ुल्फ़ की मइयत चढाने पड़ गये

सिलवटें गुम हों अगरचे यार तो
तुम समझना ख्वाब हलके पड़ गये

साथ देना था तुमारा ज़िन्दगी
पर तेरी ठोकर से छाले पड़ गये

~ सूफ़ी बेनाम

बह्र : 212-221-222-12
अर्कान - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
बह्र - बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़
काफ़िया - ए ( स्वर )
रदीफ़ - पड़ गये


Sunday, February 26, 2017

आप जब पास हों तब कौन यहाँ होता है

वज़्न - 2122 1122 1122 22/112
अर्कान - फाइलातुन फ़यलातुन फ़यलातुन फैलुन /फइलुन
बह्र - बह्रे रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ़ो मक़्तूअ

काफ़िया - आं (स्वर)
रदीफ़ - होता है

गिरह :
संग के फर्श पे कब कोई निशां होता है
प्यार गर हो न तो घर सिर्फ़ मकां होता है
मतला:
अर्श के बोसों का फिर दर्द अयां होता है
जान हर राह गली उसका मकां होता है

इक मुलाक़ात को भूला न शहर था उसका
आज तक नक्श में हर रास्ता वहां होता है

फिर मरा इश्क़ में कब कोई ग़मों का मारा
दर्द पर सीने में हर रोज़ जवां होता है

यूं तो हर रोज़ मिले दिल से लगाने वाले
आप जब पास हों तब कौन यहाँ होता है

कुछ जलाया भी करो हमको बुझाने वालों
उम्र अफ़रोज़ है औ, रोज़ समां होता है

हम थे बेताब-परेशान मुलाक़ातों को
आप के सीने में दिल रोज़ कहां होता है

शौक मजबूर बना कर के गये हैं हमको
वरना बिन आग के इस दिल में धुआं होता है

~ सूफ़ी बेनाम