Thursday, September 21, 2017

पूज दो पत्थर खुदा हो जाएगा

२१२२-२१२२-२१२

हम को तो उस दिन नशा हो जाएगा
मन दुपट्टा आपका हो जाएगा

मन हमारा आप से भर पाए तो
इश्क़ हमको दूसरा हो जाएगा

गंदलापन है हमारी चाह में
तू भी इक दिन सरफिरा हो जाएगा

इश्क़ भी इंसान का अनुमान है
चाहतों में फैसला हो जाएगा

क्यों भटकना रोज़ कू-ए-यार में
दर्द भी जब फ़ायदा हो जाएगा

हैं हज़ारों रूप उसके बरहमन
पूज दो पत्थर खुदा हो जाएगा

चाहत -ए -मन छटपटाना रोज़ का
उम्र ढल कर कायदा हो जाएगा

हाथ थामे चल रही हो नाज़नी
सोच लो अब सिलसिला हो जाएगा

गर झुकी पलकें जो तेरी प्यार में
दिल मेरा फिर से खुदा हो जाएगा

और सजदे में रहेगा आदमी
इश्क़ का जब तज़रबा हो जाएगा


~ सूफ़ी बेनाम

Monday, September 18, 2017

अब तो हैं दिल को आ गईं आँखें

२१२२-१२१२-२२

रौशन-ए-दिल दिखा गईं आँखें
मिलते ही शर्म खा गईं आँखें

कुछ झिझक सी गयी थी पल भर को
ताकने सौ दफ़ा गईं आँखें

इश्क तो दूरियों पे ज़िन्दा है
फासले सच, मिटा गईं आँखें

कैस का दिल्लगी में कोरापन
तज़रबा कुछ करा गईं आँखें

वस्ल तो जिस्म की ज़रूरत है
बाकी सब तो निभा गईं आँखें

उनको हसरत से हमने देखा तो
खामखां कसमसा गईं आँखें

हाय उनकी नज़र का बुतखाना
यार दिल को थी खा गईं आँखें

इश्क़, हसरत, खुमार, अंधापन
राज़-ए-दिल को बता गईं आँखें

प्यास दो चुस्कियों में डूबीं जब
धड़कने को बड़ा गईं आँखें

दोस्त रूमाल बन के आ जाओ
अब तो हैं दिल को आ गईं आँखें

पास सीढ़ी के सांप दो-दो हैं
दाँव पांसे लगा गईं आँखें

ख़ुशनुमा काजल-ए-सफर में हम
जब से है फ़न दिखा गईं आँखें

जेब खली है दिल भी सूना है
शौक में सब बहा गईं आँखें

बेज़ुबानी सराब चहरों की
काल दिल को लगा गईं आँखें

~ सूफ़ी बेनाम

Saturday, September 16, 2017

वफ़ा-ए-ज़िन्दगी

ग़ज़ल - वफ़ा-ए-ज़िन्दगी
१२२२ - १२२२ - १२२२ - १२२२

वफ़ा-ए-ज़िन्दगी मुझसे समझना और समझाना
खबर ले कर हमी से फिर से हमको और उलझाना

लगा रखती हो बातों में हमें तुम, जैसे बच्चा हूँ
फ़क़त इस बचपने में, मुस्कराकर और सुलगना

बला हो तुम भी कैसी, काजलों संग ख़ुशनुमा गजरे
हमारे शौकत-ए-माज़ी का, ओंठो पे यूं गदराना

नशेमन, मेरे कांधे सर टिका कर के, सजाना फिर
गुनाह-ए-हाल पर फिर से मोहब्बत में चले आना

सरल कर देना मुझको, मेरी उलझन में गले लगकर
गुदाज़-ए-इश्क़ की बाँहों में फिर सपने से फुसलाना

बहुत हैं दांव लगते, वस्ल, पेंच-ओ-ख़म तुम्हारा है
मशक़्क़त था तुम्हारे साथ में उस रात सो जाना

हूँ पच्चिस साल से ज़िन्दा, महज़ उस एक लम्हे में
दहर से दूर हैं रिश्ते हमारे, ग़श नही खाना

~ सूफ़ी बेनाम




Thursday, September 14, 2017

हूँ सूखा हुआ सा, मैं बंजर सा बदल

122 122 122 122

सितमगर के दिल से, वो फ़न ले के लौटा
रूदाद-ए-दिलों की, चुभन ले के लौटा

वहां तंग गलियों, बसे लोग सौ-सौ
अजीबो-गरीबां, कथन ले के लौटा

अथक है पिपासा, बहे मन की सरिता
महकती ग़ज़ल में, छुअन ले के लौटा

महकते-बहकते मिलो, होश में अब
मैं मीलों सफर की, थकन ले के लौटा

समुन्दर किनारे बसा इक शहर है
नया उस शहर से चलन ले के लौटा

हूँ सूखा हुआ सा, मैं बंजर सा बदल
मगर सूफ़ियाना अगन ले के लौटा

~ सूफ़ी बेनाम






Friday, September 8, 2017

वो सपना जिस की हलकों मे बहुत आराम आता है

वो सपना, जिस की हलकों मे, बहुत आराम आता है
छलक कर ओंठ से, नगमों का बन, पैगाम आता है

हमें लगता नहीं था, दिल कभी पंचर भी होगा पर
मगर आफसोस की, इस बात का इलजाम आता है

हमारी हर खता भूली, इनायत राज़दारी की
शहर के कुछ शरीफों में, हमारा नाम आता है

शराफत है बड़ी इक चीज़, वाइज़ ने सिखाया था
मगर उम्र-ए-बगावत में, कहाँ सब काम आता है

सुनो अब सोचना कुछ नहीं, बाकी रहा है पर
कलपते चाह को, तुम से सटा, आराम आता है

बहुत छिपते-छिपाते, चल रहा है, सब यहाँ अबतक
नतीजा है, हमारे नाम में, बेनाम आता है
~ सूफ़ी बेनाम

१२२२ - १२२२ - १२२२ - १२२२


 


Friday, August 25, 2017

समय की सूचियाँ

समय की सूचियों में, नाम जुड़ते हैं, नये कब -अब
पुराने लोग हैं, कुछ जो बहलने, लौट आते हैं

मिला करते हैं, हम भी अब, सभी से इश्क़ में घुलकर
उमर-बेताब को, हम कब कहां, संभाल पाते हैं

नतीजे एक से, होते कहाँ हैं, हर महोब्बत के
तज़रबा शक्ल को हम, देख के, पहचान जाते हैं

~ सूफ़ी बेनाम







बहतर है

हजारों झूठ से, बहतर है, ख्वाइश को भुलाना ही
कहो तुम सच की, सपनों से हिफाज़त, क्यों नहीं करते

कहां पर खो गये हैं, खुद नहीं मालूम है हमको
मगर तुमको भुलाने की हिमाकत, क्यों नहीं करते

अदावत रोज़ होती है, महोब्बत रोज़ मरती है
सुनो फिर नफरतों को आम, आदत क्यों नहीं करते

- सूफी बेनाम